भारत का आभूषण बाजार वर्ष 2030 तक 130-150 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो वर्तमान में 85-90 अरब डॉलर आंका गया है। यह महत्वपूर्ण वृद्धि विवाह सीजन की बढ़ती मांग, प्रीमियम उत्पादों की ओर उपभोक्ताओं के बढ़ते रुझान, संगठित खुदरा क्षेत्र के विस्तार और उपभोक्ता विश्वास में बढ़ोतरी से प्रेरित होगी। दिल्ली में 'डीजेजीएफ सिग्नेचर 2026' के दूसरे संस्करण के उद्घाटन के अवसर पर यह घोषणा की गई, जिसने उत्तर भारत के आभूषण व्यापार को प्रारंभिक सीजन में एक महत्वपूर्ण बढ़ावा दिया। यह खबर न केवल उद्योग से जुड़े लाखों लोगों के लिए बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं के लिए भी आशाजनक संकेत देती है।
भारतीय आभूषण बाजार: एक मजबूत आर्थिक स्तंभ
रत्न और आभूषण उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 7-8 प्रतिशत का योगदान देता है और कुल माल निर्यात का 12-14 प्रतिशत हिस्सा रखता है। यह क्षेत्र 50 लाख से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है। मात्रा के आधार पर, भारत दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत हीरों का प्रसंस्करण करता है और सोने के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है, जिससे वैश्विक मूल्य श्रृंखला में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
उद्योग के लिए 'नई सामान्य स्थिति' और नियामक बदलाव
'इन्फॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया' द्वारा भारत मंडपम में आयोजित 'डीजेजीएफ सिग्नेचर 2026' के उद्घाटन ने उद्योग के लिए सकारात्मक माहौल बनाया। ऑल इंडिया जेम एंड ज्वैलरी डोमेस्टिक काउंसिल (जीजेसी) के उपाध्यक्ष अविनाश गुप्ता ने बताया कि प्रदर्शकों और खरीदारों की मजबूत भागीदारी व्यावसायिक भावना और रत्न व आभूषण पारिस्थितिकी तंत्र की बढ़ती परिपक्वता को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि उद्योग एक 'नई सामान्य स्थिति' में काम कर रहा है, जहां सोने पर लगभग 3 प्रतिशत और चांदी पर करीब 5 प्रतिशत का प्रीमियम सामान्य है। साथ ही, कम भंडारण चक्र और हर 8-15 दिन में आयोजित व्यापारिक प्रदर्शनियां कम जोखिम और अधिक दक्षता के साथ खरीद प्रबंधन को सुविधाजनक बनाती हैं।
गुप्ता ने महत्वपूर्ण नियामक बदलावों का भी जिक्र किया, जिनमें भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के नेतृत्व में एचयूआईडी (हॉलमार्किंग यूनिक आइडेंटिफिकेशन) स्थानांतरण से पारदर्शिता में वृद्धि, चांदी पर अनिवार्य हॉलमार्किंग का कार्यान्वयन और धन शोधन निवारण कानून (पीएमएलए) के अनुपालन में एआई आधारित निगरानी को समर्थन शामिल है। 'इन्फॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया' के प्रबंध निदेशक योगेश मुदरास ने 2030 तक घरेलू आभूषण बाजार के 130 अरब डॉलर तक पहुंचने के अनुमान पर जोर देते हुए कहा कि यह क्षेत्र संरचित विकास के चरण में प्रवेश कर रहा है, जो त्योहारी मांग, विवाह खरीदारी और बढ़ते औपचारिकरण से संचालित होगा। दिल्ली बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (टीबीजेए) के अध्यक्ष राम अवतार वर्मा ने 'डीजेजीएफ सिग्नेचर 2026' को उद्योग की प्रगति का एक सच्चा प्रमाण बताया, जिसमें इसका पैमाना, भागीदारी और उत्साह बेहद प्रभावशाली था।
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भविष्य की संभावनाएं और विकास के कारक
यह अनुमानित वृद्धि कई प्रमुख कारकों पर आधारित है। भारतीय विवाहों में आभूषणों की पारंपरिक और सांस्कृतिक महत्ता हमेशा से रही है, और बढ़ती डिस्पोजेबल आय के साथ प्रीमियम व डिजाइनर आभूषणों की मांग में वृद्धि देखी जा रही है। संगठित खुदरा क्षेत्र का विस्तार, विशेष रूप से टियर-2 और टियर-3 शहरों में, उपभोक्ताओं तक पहुंच बढ़ा रहा है और खरीदारी के अनुभव को बेहतर बना रहा है। उपभोक्ता विश्वास में वृद्धि, जो हॉलमार्किंग जैसे नियामक कदमों से और मजबूत हो रही है, बाजार के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। एचयूआईडी और चांदी पर अनिवार्य हॉलमार्किंग जैसे कदम न केवल उपभोक्ताओं को शुद्धता का आश्वासन देंगे बल्कि उद्योग में पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ाएंगे, जिससे अनौपचारिक क्षेत्र से औपचारिक क्षेत्र की ओर बदलाव को गति मिलेगी। कम भंडारण चक्र और बार-बार होने वाली प्रदर्शनियां विक्रेताओं को बदलती मांग के अनुसार अपनी इन्वेंट्री को कुशलतापूर्वक प्रबंधित करने में मदद करती हैं, जिससे बाजार की अस्थिरता का जोखिम कम होता है।
कुल मिलाकर, भारतीय आभूषण बाजार एक मजबूत विकास पथ पर अग्रसर है। पारंपरिक मांग, आधुनिक उपभोक्ताओं की बदलती पसंद, नियामक पारदर्शिता और कुशल व्यावसायिक प्रथाओं का संगम इस क्षेत्र को 2030 तक अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य तक पहुंचने में सक्षम बनाएगा। यह वृद्धि न केवल आर्थिक समृद्धि लाएगी बल्कि लाखों लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा करेगी और वैश्विक आभूषण व्यापार में भारत की स्थिति को और मजबूत करेगी।
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.