कोलकाता: अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) शनिवार, 23 मई 2026 को अपने चार दिवसीय भारत दौरे की शुरुआत करते हुए कोलकाता पहुंच गए हैं। उनका यह दौरा भारत-अमेरिका संबंधों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसमें व्यापार, प्रौद्योगिकी, रक्षा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा और क्वाड (Quad) देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी जैसे अहम मुद्दों पर व्यापक चर्चा होने की उम्मीद है। इस यात्रा के दौरान नई दिल्ली में उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी एक महत्वपूर्ण मुलाकात प्रस्तावित है, जो दोनों देशों के बीच भविष्य के सहयोग की दिशा तय करेगी।
करीब 14 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद किसी अमेरिकी विदेश मंत्री का कोलकाता दौरा हो रहा है। इससे पहले वर्ष 2012 में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन (Hillary Clinton) ने इस शहर का दौरा किया था। ऐसे में रुबियो का आगमन राजनीतिक रूप से भी काफी अहम माना जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब पश्चिम बंगाल में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर (Sergio Gor) ने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' (X) पर रुबियो के आगमन की जानकारी देते हुए बताया कि यह उनकी पहली भारत यात्रा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) से नई दिल्ली में मुलाकात होगी, जिसमें व्यापार, टेक्नोलॉजी (Technology), रक्षा सहयोग (Defense Cooperation) और क्वाड (Quad) समेत कई रणनीतिक विषयों पर गहन चर्चा की जाएगी। रुबियो का भारत दौरा 23 से 26 मई तक प्रस्तावित है, जिसमें वह कोलकाता के अलावा नई दिल्ली, आगरा और जयपुर भी जाएंगे।
भारत-अमेरिका संबंधों में ऊर्जा और क्वाड का महत्व
माना जा रहा है कि इस यात्रा के दौरान भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा सहयोग (Energy Cooperation) को और मजबूत करने पर विशेष जोर रहेगा। दौरे से पहले मियामी (Miami) में पत्रकारों से बातचीत में रुबियो ने कहा था कि अमेरिका भारत को जितनी अधिक ऊर्जा (तेल, गैस) बेच सकेगा, उतना बेहतर होगा। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया था कि अमेरिका इस समय रिकॉर्ड स्तर पर ऊर्जा उत्पादन और निर्यात कर रहा है। भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और वैश्विक तेल आपूर्ति पर होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) की स्थिति के संभावित प्रभाव से जुड़े सवाल पर उन्होंने भारत को एक 'महान साझेदार' बताया था, जो दोनों देशों के बीच गहरे आर्थिक और रणनीतिक संबंधों का संकेत है।
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इस दौरे का सबसे अहम पड़ाव 26 मई को प्रस्तावित क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक मानी जा रही है। इस बैठक में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री हिस्सा लेंगे। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर (S. Jaishankar) इसकी मेजबानी करेंगे, जबकि ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग (Penny Wong) और जापान के विदेश मंत्री मोतेगी तोशिमित्सु (Motegi Toshimitsu) भी इसमें शामिल होंगे। क्वाड भारत के लिए हाल के वर्षों में रक्षा सहयोग, उभरती प्रौद्योगिकियों (Emerging Technologies) और सप्लाई चेन (Supply Chain) को मजबूत बनाने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific Region) में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच क्वाड को चार लोकतांत्रिक देशों के बीच रणनीतिक समन्वय बढ़ाने वाले समूह के रूप में भी देखा जा रहा है।
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने 'एक्स' पर पोस्ट कर अपने मित्र मार्को रुबियो का भारत में स्वागत करते हुए लिखा, "हमारे सामने एक महत्वाकांक्षी एजेंडा है, जिसमें क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक भी शामिल है। इसका उद्देश्य अमेरिकी राष्ट्रपति (POTUS) की उस सोच को आगे बढ़ाना है, जिसके तहत अमेरिका-भारत साझेदारी को और मजबूत बनाया जा सके। सार्थक बातचीत और ठोस प्रगति की उम्मीद है।" रुबियो के आज के शेड्यूल में सुबह कोलकाता में मदर हाउस (Mother House) और चिल्ड्रन्स होम (Children's Home) का दौरा शामिल है, जिसके बाद वे नई दिल्ली पहुंचेंगे जहां दोपहर 2:00 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे। शाम को वे अमेरिकी दूतावास सपोर्ट एनेक्स भवन (US Embassy Support Annex Building) के उद्घाटन समारोह में संबोधन देंगे और फिर राजदूत सर्जियो गोर द्वारा आयोजित रूजवेल्ट हाउस स्वागत समारोह (Roosevelt House Reception) में शामिल होंगे।
मार्को रुबियो का यह दौरा न केवल भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का संकेत देता है, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और समृद्धि सुनिश्चित करने में क्वाड की बढ़ती भूमिका को भी रेखांकित करता है। ऊर्जा सुरक्षा से लेकर रक्षा और प्रौद्योगिकी तक, कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने से दोनों देशों को दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ मिलने की संभावना है। यह यात्रा वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत की बढ़ती अहमियत और अमेरिका की 'इंडो-पैसिफिक' रणनीति के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है।
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