हालिया वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में, भारत के शेयर बाजार को एक और झटका लगा है। ताइवान के बाद अब दक्षिण कोरिया ने भी मार्केट कैपिटलाइजेशन (market capitalization) के मामले में भारत को पीछे छोड़ दिया है, जिससे भारत वैश्विक रैंकिंग में सातवें स्थान पर खिसक गया है। यह घटनाक्रम भारतीय अर्थव्यवस्था और निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन गया है, खासकर तब जब एशियाई बाजारों में पूंजी प्रवाह का रुख बदल रहा है।
ब्लूमबर्ग (Bloomberg) के आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण कोरिया में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन इस साल 86 फीसदी बढ़कर 5 ट्रिलियन डॉलर (trillion dollar) पर पहुंच गया है। इसके विपरीत, भारत का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन घटकर 4.8 ट्रिलियन डॉलर रह गया है। पिछले सप्ताह ताइवान ने भी भारत को पछाड़ दिया था, जिसका मार्केट कैपिटलाइजेशन अब 5.15 ट्रिलियन डॉलर है और वह दुनिया में पांचवें स्थान पर है। यह लगातार दूसरा सप्ताह है जब भारत को एशियाई बाजार से चुनौती मिली है, जो वैश्विक निवेश के बदलते रुझान को साफ दर्शाता है।
भारत का शेयर बाजार क्यों पिछड़ रहा है?
भारतीय शेयर बाजार पर पिछले कुछ महीनों से लगातार दबाव बना हुआ है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, विदेशी संस्थागत निवेशकों (Foreign Institutional Investors - FIIs) की लगातार बिकवाली और डॉलर (dollar) के मुकाबले रुपये (rupee) की बढ़ती कमजोरी ने बाजार की सेहत को प्रभावित किया है। इस साल अब तक बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (Bombay Stock Exchange - BSE) का सूचकांक सेंसेक्स (Sensex) करीब 12 फीसदी और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (National Stock Exchange - NSE) का निफ्टी (Nifty) लगभग 15 फीसदी गिर चुके हैं।
मनी कंट्रोल (Moneycontrol) के मुताबिक, भारत में मार्केट कैपिटलाइजेशन की कमजोरी सितंबर 2024 के आखिर से बनी हुई है। इसकी मुख्य वजह शेयरों का ऊंचा वैल्यूएशन (valuation), कंपनियों की सुस्त कमाई और विदेशी निवेशकों की निरंतर बिकवाली है। इसके अलावा, दुनिया भर में छिड़े ट्रेड वॉर (trade war), एआई (AI) से जुड़ी बड़ी कंपनियों की कमी, रुपये की कमजोरी और अमेरिका-ईरान-इज़राइल (America-Iran-Israel) तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल (barrel) से ऊपर पहुंच गई है, जिससे भारत में महंगाई बढ़ने और व्यापार संतुलन पर दबाव पड़ने का खतरा पैदा हो गया है।
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दूसरी ओर, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence - AI) से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में भारी उछाल आया है। मनी कंट्रोल (Moneycontrol) और इकोनॉमिक टाइम्स (Economic Times) की रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण कोरिया की इस तेजी की सबसे बड़ी वजह एआई (AI) और सेमीकंडक्टर (semiconductor) उद्योग में आया उछाल है। टीएसएमसी (TSMC), सैमसंग (Samsung) और एसके हिंक्स (SK Hynix) जैसी कंपनियों ने मुनाफे में जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की है। इन दोनों देशों के कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन का लगभग 60 फीसदी सेमीकंडक्टर और हाई-बैंडविड्थ मेमोरी (AI डेटा सेंटरों को चलाने वाले सबसे अहम घटक) में निवेश का है, जिससे ये देश ग्लोबल एआई वैल्यू चेन (global AI value chain) के केंद्र में आ गए हैं।
विदेशी निवेशक भारत से क्यों बाहर जा रहे हैं?
इस साल भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों ने रिकॉर्ड स्तर पर लगभग 24 अरब डॉलर (billion dollar) निकाले हैं। इसके पीछे शेयरों के महंगे दाम, कमजोर होता रुपया और बढ़ती ऊर्जा लागत जैसे कारण बताए जा रहे हैं। एमएससीआई इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स (MSCI Emerging Markets Index) में भारत की हिस्सेदारी भी पिछले वर्ष के 19 प्रतिशत से घटकर लगभग 12 प्रतिशत रह गई है।
मई महीने के आखिर में ग्लोबल इन्वेस्टर (global investor) और आर्थिक मामलों के एक्सपर्ट (expert) रुचिर शर्मा (Ruchir Sharma) ने इंडियन एक्सप्रेस (Indian Express) से बातचीत में कहा था कि "अब भारत से पूंजी इसलिए निकल रही है क्योंकि आज दुनिया का लगभग पूरा ध्यान एआई (AI) पर है।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि "निवेशक एआई की वैश्विक दौड़ को लेकर दीवाने हो चुके हैं और इस दौड़ में भारत को एक कमजोर खिलाड़ी के रूप में देखा जा रहा है। अभी दुनिया एआई के 'पिक्स एंड शॉवेल्स' (picks and shovels) चरण में है, यानी सेमीकंडक्टर (semiconductor), मेमोरी (memory) और कंप्यूटिंग (computing) क्षमता पर फोकस (focus) है। इन क्षेत्रों में भारत कमजोर है।"
ब्लूमबर्ग (Bloomberg) ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि एआई (AI) आधारित टेक शेयरों (tech shares) में भारत की गैर-मौजूदगी उस पर भारी पड़ रही है। क्रिसिल रेटिंग्स (CRISIL Ratings) की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर मध्यपूर्व में संघर्ष लंबा खिंचता है, तो कॉर्पोरेट मुनाफे (corporate profits) में लगभग 200 बेसिस पॉइंट्स (basis points) की गिरावट आ सकती है, जिससे एयरलाइंस (airlines), पॉलिएस्टर टेक्सटाइल (polyester textile), स्पेशलिटी केमिकल्स (specialty chemicals), फ्लेक्सिबल पैकेजिंग (flexible packaging) और ऑटोमोबाइल (automobile) सेक्टर (sector) सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं।
बाजार में सुधार की राह फिलहाल अनिश्चित दिखाई दे रही है। मध्यपूर्व में संघर्ष थमता नजर नहीं आ रहा है, और भारत के मौसम विभाग ने सामान्य बारिश की तुलना में 90 फीसदी मानसून (monsoon) का अनुमान लगाया है। इससे भारतीय बाजार में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि कच्चे माल की बढ़ती लागत, सप्लाई चेन (supply chain) में अड़चनें और महंगाई की वजह से इस पूरे वित्त वर्ष में भारतीय कंपनियों पर दबाव बना रह सकता है। वैश्विक एआई (AI) क्रांति में मजबूत उपस्थिति दर्ज करा पाना ही भारत के लिए इस चुनौती से उबरने का एकमात्र रास्ता प्रतीत होता है।
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.