टेलीग्राम बैन पर दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला सुरक्षित: डिजिटल अधिकार बनाम राष्ट्रीय परीक्षा की शुचिता

Delhi High Court reserves verdict on Telegram ban, balancing digital rights and exam integrity

नई दिल्ली: नीट (NEET) परीक्षा से पहले मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम (Telegram) पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह मामला डिजिटल अधिकारों, सरकारी शक्तियों के दायरे और राष्ट्रीय परीक्षाओं की शुचिता के बीच संतुलन साधने की जटिलता को दर्शाता है। जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने इस संवेदनशील मुद्दे पर सुनवाई करते हुए दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुना, जिसका असर करोड़ों भारतीय उपयोगकर्ताओं पर पड़ सकता है।

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) की अखंडता बनाए रखने के लिए टेलीग्राम पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया था, ताकि संभावित पेपर लीक या अनुचित साधनों पर रोक लगाई जा सके। हालांकि, टेलीग्राम ने सरकार के इस आदेश को कानूनी खामियों से ग्रस्त बताते हुए अदालत में चुनौती दी थी।

टेलीग्राम बैन पर दिल्ली हाई कोर्ट में जोरदार बहस

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली रिव्यू कमेटी ने टेलीग्राम के अधिकारियों की दलीलें सुनी हैं और उन्हें रिकॉर्ड पर लिया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि टेलीग्राम की प्राइवेसी पॉलिसी (Privacy Policy) में यह भी कहा गया है कि अकाउंट डिलीट करने पर सारा डेटा (Data) और मैसेज (Message) डिलीट हो जाएगा, जिससे जांच मुश्किल हो जाती है। मेहता ने टेलीग्राम को "आतंकवादी गतिविधियों के लिए सबसे पसंदीदा प्लेटफॉर्म" बताया और इसकी "आर्किटेक्चरल डिजाइन" को अन्य क्षेत्रों में भी चुनौतियों का कारण बताया। उन्होंने 2024 में हुई एक घटना का भी जिक्र किया, जहां टेलीग्राम के डेट और टाइम एडिटिंग फीचर (Date and Time Editing Feature) का दुरुपयोग कर परीक्षा खत्म होने के बाद पेपर को पुरानी तारीख का बताकर पोस्ट किया गया था, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठे थे।

टेलीग्राम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने सरकार के आदेश की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा, "क्या यह आदेश भारत की अखंडता और संप्रभुता के हित में है? क्या नीट जैसी परीक्षा भारत की संप्रभुता और अखंडता पर असर डालेगी?" उन्होंने दलील दी कि कानून इस तरह के भेद का प्रावधान नहीं करता और यदि आधार ही खत्म हो जाता है, तो उसके आधार पर पारित आदेश भी नहीं टिक सकता। उन्होंने यह भी पूछा कि जब वॉट्सऐप (WhatsApp) जैसे दूसरे प्लेटफॉर्म पर भी व्यावसायिक गतिविधियां और मार्केटिंग (Marketing) चल रही हैं, तो सिर्फ टेलीग्राम को क्यों निशाना बनाया गया।

अदालत की अहम टिप्पणियां और आनुपातिकता का सवाल

सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। अदालत ने सवाल उठाया, "हम 150 मिलियन (मिलियन) लोगों के अधिकारों को सिर्फ इसलिए कैसे रोक सकते हैं, क्योंकि कुछ नागरिक परीक्षा दे रहे हैं? सवाल यह है कि क्या आप किसी और के अधिकारों की रक्षा के लिए किसी और के अधिकारों को रोक सकते हैं?" कोर्ट ने इस मामले को "आनुपातिकता (Proportionality) के टेस्ट (Test) का मामला" बताया, जहां संभावित नुकसान और जनहित के बीच संतुलन साधना होता है, जैसा कि अनुराधा भसीन केस (Anuradha Bhasin Case) में भी कहा गया था। अदालत ने सरकार से यह भी पूछा कि क्या प्लेटफॉर्म का आर्किटेक्चर (Architecture) पर्याप्त नहीं था और इसीलिए आपातकालीन शक्तियों (Emergency Powers) की आवश्यकता पड़ी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने छात्रों की भावनाओं और राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा की विश्वसनीयता का हवाला देते हुए अदालत से इस स्तर पर हस्तक्षेप न करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि नुकसान बहुत बड़ा हो सकता है और सरकार का मकसद करोड़ों छात्रों को गुमराह होने से बचाना है। उन्होंने टेलीग्राम को उसके आर्किटेक्चर की वजह से "फ्रेंकस्टीन" (Frankenstein) बताते हुए कहा कि अगर भारत जैसा देश रोकथाम के लिए कोई कदम नहीं उठा सकता, तो कहां जाएंगे।

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला न केवल टेलीग्राम के भविष्य को आकार देगा, बल्कि भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स (Digital Platforms) पर सरकारी नियंत्रण की सीमा और नागरिकों के ऑनलाइन अधिकारों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल भी कायम करेगा। यह देखना होगा कि अदालत राष्ट्रीय सुरक्षा और परीक्षा की शुचिता के सरकार के तर्कों को, बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आनुपातिकता के टेलीग्राम के तर्कों को किस प्रकार संतुलित करती है।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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