ईरान-अमेरिका संघर्ष से वैश्विक मुद्राओं और भारत की विकास दर पर खतरा

ईरान अमेरिका संघर्ष से वैश्विक मुद्राओं और भारत की अर्थव्यवस्था पर खतरा

आईएमएफ (IMF) की पूर्व चीफ इकोनॉमिस्ट गीता गोपीनाथ ने हाल ही में इंडिया टुडे टीवी को दिए एक इंटरव्यू में भारत समेत वैश्विक मुद्राओं के लिए ईरान-अमेरिका संघर्ष से पैदा हुए खतरे पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि यह भू-राजनीतिक तनाव लंबा खिंचता है, तो इससे वैश्विक विकास दर (Global Growth Rate) में भारी गिरावट आ सकती है, जिसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) पर भी पड़ेगा। गोपीनाथ ने भारत को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता (Energy Self-Sufficiency) की दिशा में अपनी गति तेज करने की सलाह दी है, क्योंकि नियंत्रित ईंधन कीमतों (Fuel Prices) का सहारा अब खत्म होने वाला है।

गोपीनाथ के अनुसार, वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था स्थिर दिख रही है, लेकिन मिडिल ईस्ट (Middle East) में जारी संकट इस स्थिरता को कभी भी तनाव में बदल सकता है। उन्होंने कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई से खास बातचीत में कहा कि देश ने अब तक वैश्विक तेल के झटके को काफी हद तक झेल लिया है, लेकिन उपभोक्ताओं को बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों से बचाने की नीति बहुत दिनों तक नहीं चल सकती। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, 'ईंधन के मामले में मुझे नहीं लगता कि भारतीय सरकार ईंधन की कीमतों पर सब्सिडी (Subsidy) बहुत लंबे समय तक जारी रख सकती है। यह टिकाऊ नहीं है, राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) पर पड़ने वाले असर को देखते हुए यह संभव नहीं है।' उनका मानना है कि किसी न किसी वक्त पर सरकार को बढ़ती कीमतों का हिस्सा उपभोक्ताओं को मिल रहे ईंधन की कीमतों में जोड़ना ही होगा।

ऊर्जा आत्मनिर्भरता: भारत के लिए अनिवार्यता और ईरान-अमेरिका संघर्ष का असर

गीता गोपीनाथ ने इस बात पर जोर दिया कि वैश्विक झटकों ने भारत की भारी आयात निर्भरता (Import Dependence) के जोखिमों को उजागर कर दिया है। ऐसे में ऊर्जा आत्मनिर्भरता अब भारत के लिए एक राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत जितना ज्यादा आयातित ऊर्जा पर अपनी निर्भरता कम करेगा, उतना ही भविष्य के आर्थिक झटकों से निपटने के लिए बेहतर तरीके से तैयार होगा। वर्तमान में भारत की स्थिरता अस्थायी उपायों और सब्सिडी पर टिकी है, जो संकट बढ़ने पर ढह सकती है।

भारत की मौजूदा विकास दर पर टिप्पणी करते हुए गोपीनाथ ने बताया कि इस वक्त दो विपरीत ताकतें एक-दूसरे के प्रभाव को खत्म कर रही हैं। एक तरफ ईरान-अमेरिका संघर्ष भारत के लिए एक नकारात्मक झटका था, तो दूसरी तरफ अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट (US Supreme Court) के फैसले के बाद टैरिफ (Tariff) का 50 प्रतिशत से घटकर 10 प्रतिशत होना एक सकारात्मक घटना रही। इन दोनों के मिले-जुले असर के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था के इस वित्त वर्ष में लगभग 6.5 प्रतिशत की दर से बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि, यह संतुलन बेहद नाजुक है जो काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि मिडिल ईस्ट में संघर्ष कैसे आगे बढ़ता है। उन्होंने इस चल रहे संकट को 1970 के दशक से भी बड़ा तेल संकट (Oil Crisis) करार दिया है।

गोपीनाथ ने संघर्ष की अवधि के आधार पर अलग-अलग आर्थिक परिणामों की रूपरेखा पेश की। उन्होंने कहा कि यदि अगले एक हफ्ते में सब कुछ सुलझ जाता है, तो वैश्विक विकास दर में केवल 0.3 प्रतिशत की कमी आएगी। लेकिन यदि यह संकट लंबा चलता है और तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल (Barrel) तक पहुंच जाती हैं, तो वैश्विक विकास दर घटकर 2.5 प्रतिशत रह सकती है, जो सामान्य परिस्थितियों में 3.4 प्रतिशत होनी चाहिए थी। यह कटौती दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए काफी बड़ी होगी।

भारत के सामने बहुआयामी चुनौतियाँ

गोपीनाथ ने जोर देते हुए यह भी कहा कि भारत के लिए सिर्फ ऊंची कीमतें ही नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) बाधित होना भी बड़ा खतरा है। क्योंकि भारत अपनी तेल, उर्वरक (Fertilizer) और एलपीजी (LPG) जरूरतों के लिए मिडिल ईस्ट पर बहुत अधिक निर्भर है। यदि संघर्ष के कारण आपूर्ति चेन टूटती है, तो भारत में उत्पादन प्रक्रिया जटिल हो जाएगी। आपूर्ति में यह व्यवधान कीमतों में बढ़ोतरी से कहीं अधिक नुकसानदेह साबित हो सकता है, क्योंकि इसके बिना औद्योगिक और कृषि गतिविधियां ठप हो सकती हैं।

संकट गहराने पर गोपीनाथ ने चौतरफा दबाव की चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि उर्वरक की आपूर्ति रुकने से खाद्य सुरक्षा (Food Security) पर असर पड़ेगा। यदि यह युद्ध मई और जून तक खिंचता है, तो केवल भोजन, ईंधन और उर्वरक ही नहीं, बल्कि वित्तीय स्थितियां (Financial Conditions) भी कठिन हो जाएंगी। इससे भारतीय रुपये (Indian Rupee) समेत कई वैश्विक मुद्राओं पर दबाव बढ़ेगा। ऐसी स्थिति में भारत जैसी अर्थव्यवस्थाएं, जो मिडिल ईस्ट पर निर्भर हैं, अपनी विकास दर पर बहुत गंभीर प्रभाव देखेंगी।

कुल मिलाकर, गीता गोपीनाथ की टिप्पणियां भारत के नीति निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी हैं। यह केवल तात्कालिक तेल की कीमतों का मुद्दा नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन (Supply Chain Resilience) और व्यापक आर्थिक स्थिरता का सवाल है। ईरान-अमेरिका संघर्ष के अनिश्चित भविष्य को देखते हुए, भारत को अपनी आर्थिक नींव को मजबूत करने और बाहरी झटकों के प्रति अपनी भेद्यता (Vulnerability) को कम करने के लिए दीर्घकालिक रणनीतियों पर तत्काल ध्यान देना होगा।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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